Polyandry tradition : एक दुल्हन, दो दूल्हे, सुर्खियों में हिमाचल की अनोखी शादी

हिमाचल प्रदेश के सुंदर Trans-Giri क्षेत्र में हाट्टी जनजाति की इस झलक ने इंटरनेट और सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। 12 से 14 जुलाई, 2025 की तारीख में, शिल्लाई गांव में सुनीता चौहान ने दो भाइयों ‑ प्रदीप एवं कपिल नेगी ‑ के साथ अपनी जोड़िदारा (polyandry) परंपरा के अनुसार विवाह किया 

इस तीन-दिवसीय उत्सव में पारंपरिक गीत-नृत्य, स्थानीय रीति-रिवाज, और ग्रामीण प्रेम झलकता था, जहां सुनीता ने खुलकर कहा कि यह “उसने पूरी जानकारी में, बिना दबाव के फैसला किया” 

राजस्व कानूनों में इसे “जोड़िदारा” के रूप में स्वीकृति प्राप्त है, जो हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा आदिवासी परंपरा के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है

परंपरा का कारण – इतिहास और आधुनिक ज़रूरतें

जोड़िदारा—जिसे उजाला पक्ष या जाजदा भी कहते हैं—के मुख्य उद्देश्य हैं:

1. पारिवारिक ज़मीन का विभाजन न हो और आर्थिक समृद्धि बनी रहे 

2. संयुक्त परिवार की एकता और भाईचारे को बढ़ावा मिले 

3. सामाजिक-आर्थिक तनाव से परिवार की रक्षा हो सके, खासकर पहाड़ी इलाकों में 

यह प्रथा पहले सिरे से कुछ अन्य हिल ट्राइबल इलाकों—जैसे कि किन्नौर (हिमाचल), जौनसर बबर (उत्तराखंड)—में भी प्रचलित थी 

इतिहास में ऐसे मामले

* पिछले 6 सालों में हाट्टी समुदाय के बधाना गांव में कम से कम 5 ऐसे polyandrous विवाह दर्ज हुए 

* इसी प्रकार, किन्नौर और जौनसर बबर में यह रीति अप्रकट तरीके से मौजूद है 

* यह विश्वास करते हैं कि प्राचीन महाभारत काल से भी चली आ रही हैं—जैसे द्रौपदी और पांच पांडवों की कथा

मौजूदा ज़िंदगी: परंपरा या सोशल मीडिया ट्रेंड?

सभी पक्ष इस विवाह को पारदर्शी और स्वेच्छा पर आधारित बताते हैं 
सुनीता, प्रदीप और कपिल का कहना है कि यह परिवार और सामाजिक खेती के लिहाज से उचित निर्णय है सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और तस्वीरें हाईलाइट हैं—लेकिन यह केवल “ट्रेंड” नहीं, बल्कि वास्तविक सामुदायिक व्यवहार को उजागर कर रहा है

क्या यह सिर्फ सोशल मीडिया शोर है या सच्चाई?

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परंपरा का आधार मजबूत और वास्तविक है, जैसा कि:

1. राजस्व कानून और स्थानीय आदिवासी नियम इसका समर्थन करते हैं 

2. उच्च न्यायालय द्वारा भी सांस्कृतिक परंपरा के रूप में मान्यता मिल चुकी है,

3. जनमत में बदलाव और शिक्षा के बावजूद, यह अभी भी कुछ गांवों में खुले मन से अपनाई जा रही है 

विवाह के बाद की ज़िंदगी: क्या सब कुछ सहज होता है?

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जोड़िदारा (Polyandry) विवाह दिखने में जितना अनूठा लगता है, व्यवहारिक जीवन में उतना ही संतुलन और सहमति की मांग करता है।हालांकि कई जोड़े इसे खुशी-खुशी निभा रहे हैं, लेकिन सामान्य पारिवारिक जीवन में चुनौतियां भी सामने आई हैं, खासकर जब:

1. पारस्परिक ईर्ष्या या भावनात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है। 

2. बच्चों को पालने और पितृत्व को लेकर कानूनी अस्पष्टता और सामाजिक उलझन सामने आती है।  

3. अगर एक पति दूसरे से अधिक समय या स्नेह पाता है तो परिवार में तनाव के हालात बन सकते हैं।

कुछ ज्ञात उदाहरण जहां तनाव सामने आया:

1. किन्नौर ज़िले के एक केस (2019, लोकल रिपोर्ट्स के अनुसार) में, दो भाइयों से विवाह करने वाली महिला ने यह दावा किया कि एक पति उसके साथ ज़्यादा कठोरता से पेश आता है। मामला पंचायत में गया और स्थानीय सामाजिक समझौते के जरिए सुलझाया गया

2. 2021 में उत्तराखंड के जौनसर-बावर क्षेत्र में एक और मामला सामने आया, जिसमें एक महिला ने शादी के 3 साल बाद दोनों भाइयों से अलग होने की इच्छा जताई। वजह – “भावनात्मक थकावट और असमानता”।

3. कुछ मामलों में, जब एक पति शहर चला जाता है (रोज़गार के लिए), तब रिश्ते की संतुलन टूटता है और महिला को मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है।

फिर भी क्यों निभती है यह परंपरा?

इसके बावजूद, हाट्टी और किन्नौरी समाज के कई लोग मानते हैं कि जब यह परंपरा पारदर्शिता, आपसी समझ और स्वेच्छा के साथ निभाई जाती है, तो रिश्ते सफल रहते हैं।

समुदायों में “पारिवारिक बैठकों” और “स्थानीय पंचायतों” की भूमिका अहम होती है जो असहमति को सुलझाने का कार्य करती हैं।

महिलाएं भी अब अपनी राय स्पष्ट रूप से रखने लगी हैं, जो तनाव को जल्दी हल करने में सहायक होता है।

भविष्य: क्या बनेगी परंपरा?

Photos from social media

शहरीकरण और शिक्षा का विस्तार इस आदत को धीरे-धीरे कम कर सकता है

फिर भी, एक संवेदनशील, जागरूक समुदाय इसे अब भी अपनाने के लिए तैयार दिख रहा है।

सुनीता, प्रदीप और कपिल की आज़ादी से लिए गए फैसले ने एक नए संदेश को जन्म दिया है—जहाँ परंपरा, स्वेच्छा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकते हैं।

निष्कर्ष

यह मामला सिर्फ विडियो या इंटरनेट के लिए नहीं है—यह संस्कृति, जमीन और सामाजिक जुड़ाव का जीवंत उदाहरण है। हिमाचल की यह जोड़िदारा परंपरा आज भी स्वाभिमानी ढंग से जीवित है, और इसने हमें दिखाया है कि भारत की विविधता सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि अब भी जीवन का हिस्सा है।

आपकी राय जानना चाहेंगे! कैसे समझते हैं आप इस परंपरा को समृद्धि भरा विरासत या समय की मांग? नीचे कमेंट करें।

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