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| क्या है टैरिफ और डेड इकॉनमी (Photo Credit by Copilot ) |
हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म Truth Social पर भारत को लेकर Dead Economy शब्द का इस्तेमाल किया। ट्रप की यह टिप्पणी भारत पर 25% का भारी टैरिफ लगाने की उनकी घोषणा के साथ आई है। ट्रंप के इस बयान का भारत में कई राजनेताओं और विशेषज्ञों ने कड़ा विरोध किया है। ट्रंप पहले भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ (Tariff) यानी आयात शुल्क बढ़ाने की नीति के चलते सुर्खियों में रहे हैं।
इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि टैरिफ क्या होता है, इसे कौन और कब लगाता है, इसका दो देशों के व्यापार पर क्या असर होता है। साथ ही, डेड इकॉनमी टर्म का मतलब, इसके लक्षण, और इससे उबरने के उपायों पर विस्तार से बात करेंगे।
पोस्ट में क्या लिखा अमेरिकी राष्ट्रपति ने...
भारत पर 25% टैरिफ लगाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म Truth Social प रभारत और रूस को डेड इकोनॉमी बताया। उन्होंने कहा- भारत और रूस अपनी अर्थव्यवस्था को साथ ले डूबें, मुझे क्या। इसके जवाब में रूस के पूर्व राष्ट्रपति मेदवेदेव ने कहा अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्रपति घबरा गए हैं। एक दिन पहले ट्रम्प ने भारत पर 1 अगस्त से 25% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। अभी अमेरिका की तरफ से भारतीय सामानों पर औसतन करीब 10% टैरिफ लगता है। इसके बढ़ने से अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान के दाम बहुत बढ़ जाएंगे। ये रही ट्रंप की पोस्ट...
टैरिफ (Tariff) क्या होता है?
टैरिफ एक प्रकार का टैक्स (शुल्क) होता है जो किसी देश में बाहर से सामान लाने यानी आयात (Import) पर लगाया जाता है। आसान शब्दों में, जब कोई उत्पाद अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके किसी देश में प्रवेश करता है, तो उस देश की सरकार आयातक कंपनी से जो शुल्क वसूलती है, उसे ही टैरिफ कहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी उत्पादों को घरेलू बाजार में महंगा बनाना है, ताकि स्थानीय रूप से बने उत्पादों की मांग बढ़े।
टैरिफ लगाने के उद्देश्य:
घरेलू उद्योगों की सुरक्षा
विदेशी उत्पादों को महंगा कर घरेलू खरीद को बढ़ावा देनासरकार की कमाई बढ़ानाराजनीतिक दबाव बनाना (जैसे ट्रेड वॉर)
टैरिफ कौन और कैसे लगाता है?
किसी भी संप्रभु देश की सरकार टैरिफ तय करती है।
यह वाणिज्य मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और सीमा शुल्क विभाग के माध्यम से लागू होता है।विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के तहत देशों को टैरिफ लगाने की आज़ादी है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें होती हैं। WTO के सदस्य देश आपस में बातचीत करके टैरिफ की अधिकतम दरें तय करते हैं, जिन्हें "बाध्य शुल्क" (Bound Tariffs) कहा जाता है। कोई भी सदस्य देश बिना उचित बातचीत और मुआवजे के इन दरों से अधिक शुल्क नहीं लगा सकता।
होते हैं रणनीतिक और आर्थिक कारण
घरेलू उद्योगों की सुरक्षा: यह टैरिफ का सबसे आम कारण है। जब विदेशी सामान महंगा हो जाता है, तो उपभोक्ता घरेलू उत्पाद खरीदने के लिए प्रोत्साहित होते हैं, जिससे स्थानीय कंपनियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा मिलती है।
सरकारी राजस्व बढ़ाना: टैरिफ सरकार के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है, खासकर उन विकासशील देशों में जहां अन्य कर प्रणालियाँ उतनी मजबूत नहीं होतीं।
व्यापार घाटे को कम करना: यदि कोई देश आयात अधिक और निर्यात कम कर रहा है, तो वह आयात को हतोत्साहित करने के लिए टैरिफ का उपयोग कर सकता है।
राजनीतिक और रणनीतिक दबाव: कई बार देश अन्य देशों पर अपनी नीतियां बदलने के लिए दबाव बनाने या उनकी अनुचित व्यापार प्रथाओं के जवाब में प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के रूप में टैरिफ लगाते हैं।ट्रंप द्वारा लगाया गया टैरिफ इसी श्रेणी में आता है, जिसे "रेसिप्रोकल टैरिफ" (पारस्परिक शुल्क) कहा जाता है।
टैरिफ का व्यापार पर असर
सकारात्मक प्रभाव:
नकारात्मक प्रभाव:घरेलू उद्योगों को बढ़ावा: टैरिफ स्थानीय उत्पादकों को एक संरक्षित बाजार प्रदान करता है, जिससे उन्हें और फलने-फूलने का अवसर मिलता है।
रोजगार सृजन: जब घरेलू उद्योगों का विकास होता है, तो देश में रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा: कुछ रणनीतिक उद्योगों, जैसे रक्षा और ऊर्जा, को विदेशी निर्भरता से बचाने के लिए भी टैरिफ का उपयोग किया जाता है।[9]
उपभोक्ताओं पर बोझ: आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है।
व्यापार युद्ध (Trade War): एक देश द्वारा टैरिफ लगाने की कार्रवाई के जवाब में दूसरा देश भी जवाबी टैरिफ लगा सकता है, जिससे एक व्यापार युद्ध की स्थिति बन जाती है। इससे वैश्विक व्यापार श्रृंखला बाधित होती है और दोनों ही देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुँचता है।
विकल्पों की कमी: टैरिफ के कारण उपभोक्ताओं के लिए बाजार में उपलब्ध उत्पादों के विकल्प कम हो सकते हैं।
अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर का उदाहरण:
2018 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने चीन से आयात पर भारी टैरिफ लगाया था। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका पर टैरिफ लगाया, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हुई।
टैरिफ का इतिहास: पहली बार किस देश ने लगाया?
टैरिफ का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीन साम्राज्यों में भी व्यापार मार्गों पर चुंगी या शुल्क वसूलने की प्रथा थी।हालांकि, आधुनिक औद्योगिक युग में, 18वीं और 19वीं शताब्दी में ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों ने अपने उद्योगों को बचाने के लिए इसे एक नीति के रूप में अपनाया। साल 1930 में अमेरिका द्वारा लागू किया गया स्मूट-हॉली टैरिफ एक्ट (Smoot-Hawley Tariff Act) एक कुख्यात उदाहरण है, जिसने विदेशी उत्पादों पर टैरिफ बहुत बढ़ा दिया था। इसके जवाब में 25 से अधिक देशों ने भी अमेरिकी सामानों पर टैरिफ बढ़ा दिए, जिससे वैश्विक व्यापार में 66% तक की भारी गिरावट आई और इसने 1930 की महामंदी को और गहरा कर दिया।
'डेड इकॉनमी': एक राजनीतिक शब्दावली
क्या होती है 'डेड इकॉनमी'?
सबसे पहले यह समझना महत्वपूर्ण है कि 'डेड इकॉनमी' (Dead Economy) कोई आधिकारिक या मानक आर्थिक शब्द नहीं है। अर्थशास्त्री इस शब्द का प्रयोग नहीं करते। यह एक राजनीतिक और अलंकारिक शब्दावली है, जिसका इस्तेमाल किसी देश की अर्थव्यवस्था की अत्यंत गंभीर और निराशाजनक स्थिति को बताने के लिए किया जाता है।
जब कोई इस शब्द का प्रयोग करता है, तो उसका आशय एक ऐसी अर्थव्यवस्था से होता है जहां:
1. आर्थिक विकास दर लगभग शून्य या नकारात्मक हो गई हो।
2. बेरोजगारी दर बहुत ऊँची हो।
3. महंगाई (या कुछ मामलों में अपस्फीति) नियंत्रण से बाहर हो।
4. निवेश और औद्योगिक उत्पादन ठप पड़ गया हो।
5. लोगों की आय में भारी गिरावट आ रही हो।
6. कोई अर्थव्यवस्था 'डेड' क्यों कहलाती है?
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के इस भयावह स्थिति में पहुँचने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे:
लंबी राजनीतिक अस्थिरता या गृहयुद्ध: इससे देश का पूरा आर्थिक ढाँचा चरमरा जाता है।
गलत आर्थिक नीतियां: सरकार द्वारा लिए गए गलत फैसले, जैसे अत्यधिक नोट छापना (हाइपरइन्फ्लेशन) या उद्योगों का गलत तरीके से राष्ट्रीयकरण करना।
प्राकृतिक आपदाएं या महामारी: ये घटनाएं भी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध: अन्य देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंध भी किसी देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बना सकते हैं।
ऐतिहासिक उदाहरण और उबरने के उपाय
विश्व इतिहास में कई देशों ने गंभीर आर्थिक संकटों का सामना किया है, जिन्हें बोलचाल की भाषा में 'डेड इकॉनमी' की स्थिति जैसा कहा जा सकता है। जिम्बाब्वे में 2000 के दशक के अंत में हाइपरइन्फ्लेशन, हाल के वर्षों में वेनेजुएला का आर्थिक पतन, और प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की स्थिति इसके कुछ उदाहरण हैं।
| देश | कारण | परिणाम |
|---|---|---|
| वेनेजुएला | कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भरता, राजनीतिक भ्रष्टाचार | महंगाई 10 लाख % से भी ऊपर, पलायन |
| जिम्बाब्वे | ज़बरदस्त मुद्रास्फीति, भूमि सुधार की विफलता | आर्थिक ढांचा लगभग ध्वस्त |
| ग्रीस | यूरोज़ोन कर्ज संकट, टैक्स चोरी | यूरोपीय संघ से बेलआउट |
ऐसी गंभीर स्थिति से उबरना एक लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया होती है। इसके लिए कुछ प्रमुख कदम उठाए जा सकते हैं:
संरचनात्मक सुधार: सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों में बड़े बदलाव करने पड़ते हैं, जैसे व्यापार नियमों को सरल बनाना, सरकारी खर्च में कटौती करना और राजस्व के नए स्रोत बनाना।
राजनीतिक स्थिरता: देश में शांति और एक स्थिर सरकार का होना पहली शर्त है।
अंतरराष्ट्रीय सहायता: कई बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से वित्तीय मदद की आवश्यकता पड़ती है।
निवेश को आकर्षित करना: देश में निवेश का माहौल सुधारकर विदेशी और घरेलू निवेश को बढ़ावा देना जरूरी होता है।
ट्रंप की टिप्पणी और विशेषज्ञों की राय
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत को 'डेड इकॉनमी' कहना, विशेषज्ञों के अनुसार, तथ्यों से परे एक राजनीतिक बयान है।अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और अन्य वैश्विक एजेंसियां लगातार भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बता रही हैं। 2015-25 के बीच भारत की औसत जीडीपी वृद्धि दर 6% से अधिक रही है, जबकि उसने कोविड-19 जैसी महामारी और वैश्विक संकटों का भी सामना किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
टैरिफ पर: टैरिफ एक दोधारी तलवार है। यह घरेलू उद्योगों को अल्पकालिक सुरक्षा दे सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह व्यापार युद्ध को जन्म दे सकता है जो अंततः सभी के लिए हानिकारक है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का विश्लेषण है कि अमेरिका की यह नीति संरक्षणवाद को बढ़ावा देती है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि टैरिफ से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
'डेड इकॉनमी' पर: विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि यह शब्द आर्थिक विश्लेषण के बजाय एक राजनीतिक हमले का हिस्सा है।भारत की अर्थव्यवस्था, जिसमें एक विशाल मध्यम वर्ग, बढ़ता सेवा क्षेत्र और मजबूत घरेलू मांग है, उसे 'डेड' कहना तथ्यों की अनदेखी करना है।हालांकि, भारत के विपक्षी नेताओं ने ट्रंप के बयान का हवाला देते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों, विशेषकर बेरोजगारी और महंगाई को लेकर आलोचना की है।
फिर उजागर हुईं आर्थिक स्वास्थ्य की जटिलताएं
डोनाल्ड ट्रंप की हालिया टिप्पणियों ने टैरिफ और आर्थिक स्वास्थ्य की जटिलताओं को एक बार फिर उजागर कर दिया है। टैरिफ एक वास्तविक और शक्तिशाली आर्थिक उपकरण है जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव हो सकते हैं, और इसका उपयोग सावधानी से और अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत किया जाना चाहिए। वहीं, 'डेड इकॉनमी' एक औपचारिक आर्थिक सिद्धांत न होकर एक राजनीतिक जुमला है, जिसका उद्देश्य अक्सर तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना होता है।
....कुल मिलाकर टैरिफ और डेड इकॉनमी दो ऐसे आर्थिक टर्म हैं जो किसी देश की नीति, नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर सीधा असर डालते हैं। जहां टैरिफ रणनीतिक हो सकते हैं, वहीं डेड इकॉनमी की स्थिति से बचने के लिए सतत नीति और पारदर्शिता आवश्यक है। भारत को फिलहाल डेड इकॉनमी कहना तथ्यों के आधार पर सही नहीं है और ऐसे बयानों से आर्थिक विमर्श भटक सकता है।
